Saturday, 23 March 2019

लाइफ मंत्रा: द एक्स फैक्टर

लाइफ मंत्रा: द एक्स फैक्टर

दुनिया कई प्रकार के लोगो से भरी हुई है,यहाँ टेलेंट की कोई कमी नहीं,और न ही कमी है असफल आदमियों की,और उससे भी ज्यादा संख्या है यहाँ टेलेंटेड असफल व्यक्तियों की,जो टेलेंटेड तो बहुत है मगर फिर भी असफल है,एक सफल इंसान बनने के लिए जो कुछ चाहिए वो सब कुछ होते हुए भी वो असफलता की श्रेणी में आते है तो सिर्फ इसलिए की उनमे कुछ मिसिंग है वो एक महत्वपूर्ण चीज मिसिंग है जिसे आम बोलचाल की भाषा में  "एक्स फैक्टर"कहा जाता है,

मैंने खुद महसूस किया है कि मेरे आस पास के कुछ लोग जो मुझ से कमतर थे, आज मुझसे कंही बेहतर स्थिति में है,चाहे वो सामाजिक क्षेत्र हो,आर्थिक क्षेत्र हो ,पारिवारिक  क्षेत्र हो,या राजनितिक क्षेत्र हो,मगर अपने एक सिमित टेलेंट की बावजूद वो आज अपने अपने क्षेत्र में सफलता से स्थापित है,बचपन से ये पढ़ते और सुनते आये है कि नॉलेज इस पॉवर, लेकिन आज कल महसूस होने लगा है कि बहुत ज्यादा ज्ञान कंफ्यूज करता है, जिस ज्ञान को आप उपयोग में नहीं लेते है वो आपके लिए एसेट्स नहीं बल्कि लाइबिलिटी के तौर पे काम करता है,हर चीज का ज्ञान होना बहुत अच्छी बात है लेकिन एक चीज में स्पेशलिस्ट होना भी आवश्यक है,

आपका दिमाग तेज है अच्छी बात है,लेकिन आपके तेज दिमाग एक दोधारी तलवार की तरह होता है जिसे अगर ढंग से संभाला नहीं गया तो वो खुद को ही काट लेता है,वैसे है अपने आप इकठ्ठा किया गया ज्ञान अगर सही ढंग से उपयोग होने पर आपको मेंटल स्ट्रेस देता है,

आज मोबाइल में कई एप्प्स है जो हमारी जिंदगी को आसान बनाते है,और हम उन्हें मोबाइल में इंस्टाल कर के रखते है,और धीरे धीरे इतने सारे एप्प्स इनस्टॉल कर लेते है कि उनका उपयोग ही नहीं करते और यही सभी एप्प्स धीरे धीरे आपका मोबाइल डाटा बरबाद करते है मोबाइल का स्टोरेज बढ़ा कर उसे स्लो करते है और मोबाइल को हैंग करने लगते है,और लगभग ऐसा ही हम अपनी जिंदगी के साथ भी करते है,कोई भी यूटिलिटी जब तक उपयोग  ना की जाए तो एक लियाबिलिटी है,

मुम्बई में मेरे बहन का एक किराए का घर है इस 500 स्क्वायर फ़ीट के घर का भाड़ा लगभग 45000 है और मेन्टेन्स का 5000 अलग से है लगभग 50000 रूपये महीना,मतलब 100 रूपये स्क्वायर फ़ीट भाड़ा,एक बार उन्हें एक मॉल में शॉपिंग में एक फ्लावर पॉट फ्री ऑफर हुआ, और फ्री का माल किसे अच्छा नहीं लगता,लेकिन घर आने के बाद जब वो फ्लावर पॉट घर में लगाया गया तो।उसने 2x 2 फ़ीट की जगह घेर ली अब देखा जाए तो एक फ्री के फ्लावर पॉट के लिए वो हर महीने 400/-भाड़ा दे रहे है, ऐसे ही मुफ्त की चीजे और ज्ञान हमें लगता है कि हमारी जिंदगी आसान बना देंगे लेकिन अंततः वो हमारे लिए लियाबिलिटी ही साबित होते है,

घर में छोटी मोटी इलेक्ट्रीक प्रॉब्लम के लिए अक्सर इलेक्ट्रीशियन आते है और ठीक कर के चले जाते है एक छोटे से 10 मिनट के काम के लिए 200-300 रुपये ले जाते है,बहुत तकलीफ होती है ऐसा लगता है कि इतना सा काम था ,कितना आसान काम था,हम ही कर लेते,लेकिन कभी कर के देखिये आपको उस 10 मिनट का काम के लिए 2 घंटे से अधिक समय लगेगा तब लगेगा कि नहीं यार इससे अच्छा तो हम उसे 100-200 दे देते,एक्चुअली प्रोफ़ेशनल लोगो द्वारा किया हुआ काम देखने में आसान लगता है क्योंकि उन्होंने इस काम में महारथ हासिल की हुई है,वो एक्सपर्ट है उसी काम के,स्पेशलिस्ट है,और इस स्पेश्लिटी को हासिल करने के पीछे उनकी कई सालों की कड़ी मेहनत है,हम जो प्रोफ़ेशनल लोगो को पेमेंट करते है वो 10 मिनट के काम की नहीं उस बरसो की मेहनत का पेमेंट करते है,

दुनिया में आपकी कीमत उस काम से निर्धारित नहीं होती की आप क्या काम कर सकते है,बल्कि आपकी कीमत इस बात से निर्धारित होती है कि वो काम आपके अलावा कोई नहीं कर सकता,और ऐसा करने के लिए स्पेशलिस्ट बनना पड़ता है,और स्पेसलिस्ट बनने के लिए एक्स फैक्टर चहिये,कैंडी क्रश हो या जिंदगी आप आगे तभी बढ़ते है जब आप आगे आने वाली चुनीतियो को स्वीकार करते है और अपने काम में लगे रहते है,अक्सर 1 किलो काबिलियत पर 100 ग्राम निरंतरता भारी पड़ती है,

खुद को किसी काम के लिए मोटिवेट करना बहुत आसान है आप किसी अच्छे लेखक की किताब पढ़कर,कुछ अच्छे विचार पढ़कर,कभी किसी को देखकर मोटीवेट हो सकते है लेकिन ये मोटिवेशन बनाए रखना बहुत मुश्किल है,हम तभी आगे बढ़ते है जब वो मोटिवेशन हमारी आदत बन जाती है,और आदत बनाने के लिए हमें किसी भी चीज को निरंतर करना पड़ता है,लेकिन किसी भी काम को लगातार करना इतना आसान नहीं है,थोड़े दिनों बाद हम अपने आप से बोर होने लगते है,हमारा धैर्य जवाब देने लगता है,हमें काम बोझ लगाने लगता है और अंततः हम काम को तब छोड़ देते है जब वो पूरा होने वाला होता है, रेस में फर्स्ट आने वाला ,सेकंड आने वाले से दुगुनी मेहनत नहीं करना बस थोड़ी सी ज्यादा मेहनत करता है और यही थोड़ा सा अतिरिक्त प्रयास उसे दुगुना लाभ और सफलता देता है,

जिंदगी के साथ भी लगभग यही है हमें अपने आप में एक क्षेत्र में कोई आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है बल्कि हर क्षेत्र में थोड़े बहुत निरंतर सुधर की आवश्यक्ता है,और ये कंटीन्यूटी ही वो एक्स फैक्टर है जो आपको सफल बनाती है आपको पहचान दिलाती है जो आपको सम्मान दिलाती है, जो आपको स्पेसलिस्ट बनाती है,

विकल्प कई मिलेंगे राह भटकाने के लिए,
संकल्प एक ही काफी है मंजिल तक पहुचाने के लिए,

अपने संक्लपो पर अडिग रहिये,

इस लेख के प्रति आप सभी की अमूल्य राय की प्रातिक्षा में,

Friday, 18 January 2019

लाइफ मंत्रा: 10 years challenge

बहुत दिनों बाद एक लेख लिखा है,जो की ये महसूस हो रहा है कि दिल से निकला है और सिर्फ मेरे ही नहीं मेरे हमउम्र लोगो की मन की बात है

लाइफ मंत्रा: #10yearchallenge

आज कल सोशल मीडिया में एक मुहीम छाई हुई है जिसे #10 years chaalenge के नाम से सोसल मीडिया में ट्रेंड किया जा रहा है,इस चेलेंज में कई सेलेब्रेटी अपनी करंट और 10 साल पुरानी फोटो डाल रहे है और दूसरों को भी ऐसा करने को कह रहे है,इस तरह की खबरों को मैं एक पब्लिसिटी स्टंट और " चुतियापा" के अलावा कुछ नही मानता  और ऐसे चूतियापे में पार्टिसिपेट करने का न ही कोई मूड है लेकिन इस #10 years challenge ने मुझे एक बात को सोचने पर विवश किया की इन दस सालों में मैं फिसिकली नहीं बल्कि मेंटली कितना बदल गया हूं,

और ये बात काफी इंटरस्टिंग लगी और लगा जो चेंग इन 10 सालो में मुझमे आया है लगभग वही चेंज मेरे आयु वर्ग के मेरे सभी साथियों में भी आया है,10 साल पहले एक इंडिपेंडेंट लाइफ जीने वाला व्यक्ति आज बहुत से जिम्मेदारियो का गुलाम है,वक्त बेवक्त जबरजस्ती ठहाके लगाने वाले व्यक्ति को आज कल हसंने के लिए एक वजह का इंतेजार रहता है,हर बात के पीछे एक कारण चाहिए होता है,चाहे वो फॅमिली गेट टुगेथेर के लिए हो या दोस्तों से मिलने के लिए, छोटी छोटी खुशियॉ आज कल खुश नहीं करती,हर पल ये डर रहता है कि कंही कोई गलती न हो जाए जिससे कोई नाराज न हो जाए, किसी से नाराज होने से भी डर लगता है क्योकि क्या पता वो मनाने आये या न आये,न्यू ईयर,वेलेंटाइन,होली,दिवाली कोई भी त्यौहार अब रोमांचित नहीं करते है,ये सब भी आजकल आम दिनों की तरह लगते है,पहले काउंट किया करते  था की मैं कि अगले साल 25 या 26 साल का हो जाऊँगा,अभी नेगीटिव काउंटिंग शुरू है आज कल हिसाब होता है कि और जिंदगी में कितने साल बचे है,

बचपन में पहले पेन्सिल से लिखा जाता है और बड़े होते होते पेन दे दिया जाता है शायद इस लॉजिक के साथ की बचपन में की गयी गलतियां सुधारी जा सकती है मगर बड़े हो जाने पर एक बार जो लिख दिया लिख दिया, पिछले 10 सालों में  पेन्सिल खो गयी है और सारे कर्म पेन से लिखे जैसे हो गए है,गलतियां मार्कर से लिखी पंक्तियों जैसी हो गयी है जो एक बार लिखी गयी तो अमिट हो जाती है, उसे कोई अनदेखा ही नहीं करता,

खुद के लिए खुशी की परिभाषा खुद खुश रहना नहीं बल्कि लोगो को खुश रखना हो गया है,हर काम करने से पहले एक बार सोशल स्टेटस का ध्यान जरूर आता है, एक संघर्षशील युवा से हटकर छवि एक असफल योग्य व्यक्तित्व के रूप से होती जा रही है,

कोई बात पसंद न आये तो उसके लिए प्रतिक्रया देने का तरिका बहुत बदल गया है पहले जहां नापसंदगी की प्रतिक्रिया गुस्सा,रोष और चिल्लाना हुआ करता था अब नापसंदगी पर बस एक हल्की से मुस्कराहट और लम्बी खामोशी ही प्रतिक्रया है, शौक की खातिर कुछ करना बड़ा मेहनत और झुंझलाहट का काम लगता है, अपनी भावनाएं को कहने के लिए आज कल रियल नहीं वर्चुअल दुनिया(सोशल मीडिया) का सहारा लेना पड़ता है,खुश रहने से ज्यादा जरुरी खुश दिखना है क्योकि खुश न दिखने पर फेसबुक में फोटो को लाइक्स ज्यादा नहीं आते, बोलना,चलाना,नाचना,हँसना,पहनना इन सबके लिए अपने आप को शिष्टचार और औपचारिकता के दायरे में बाँध लिया गया है ,हर काम से पहले ये सोचना पड़ता है कि " लोग क्या कहंगे" ,

कुल मिलाकर पहले और आज के 10 सालो में जिंदगी इतनी बदली है कि पहले ये देखा करते थे की हर पल में जिंदगी है, अब ये गिनते है कि जिंदगी में कितने पल है,
आज कल जिंदगी जी नहीं जा रही,बल्कि सिर्फ गुजारी जा रही है,पिछले 10 सालों ने नाम,शोहरत,इज्जत,पहचान तो बहुत दी,मगर इस बात की एक कसक हमेशा रहेगी की पिछले 10 सालो ने मुझसे मेरा बचपना छीन लिया,

अब अपने और अपने हमउम्र लोगो के लिए बस एक ही सलाह है कि

यु गुजरते दिनों के साथ न खुद को शर्मिन्दा रखिये,
अगर बढ़ती उम्र को हराना है तो शौक कुछ ज़िंदा रखिये

Tuesday, 23 October 2018

लाइफ मंत्रा- एक पल में हालात बदल जाते है,निराश मत होइए

लाइफ मंत्रा- एक पल में हालात बदल जाते है,निराश मत होइए,

आप सभी व्हात्सप्प के कई ग्रुप में होंगे ,कई बार आपने ग्रुप की डिटेल देखि होगी और नोट किया होगा की हर व्हासप्प ग्रुप में आपका आपका नाम सबसे निचे होता था, मगर व्हात्सप्प के  नए अपडेट में अब आपका नाम सबसे ऊपर आता है,एक छोटे से तकनिकी परिवर्तन ने आपको सबसे निचे से उठाकर सबसे ऊपर बैठा दिया,

हमारी जिंदगी में भी काफी कुछ ऐसा ही है,कई लोग जिन्हे हम महत्व नहीं देते जिन्हे हम ओछा या छोटा समझते है कब समय का एक छोटा सा चक्र उन्हें सफलता की बुलंदियों पर पहुचा देगा पता नहीं चलता,हमें अक्सर अपने आप पर,अपनी प्रतिभा पर,अपने ओहदे पर,अपने सामाजिक प्रतिस्ठा पर, बड़ा गुमान होता है,और इसके भरम में हम अक्सर अपनो से छोटे लोगो के साथ गलत व्यवहार करते है,उन्हें हिन् भावना से देखते है,

अक्सर "दूर" से या "गुरुर" से देखने पर चीजे छोटी नजर आती है, हम ये भूल जाते है कि हर हीरा पहले कोयला ही होता है,जिंदगी एक फ्लैग मार्च की तरह ही है जहां एक बार "पीछे मुड़" बोलते है सबसे आगे वाला इंसान सबसे पीछे और सबसे पीछे वाला इंसान सबसे आगे हो  जाता है,

यहाँ एक और बात भी गौर करने की है कि कभी भी किसी परिस्थिति में अपने आप को छोटा या कम मत समझिये क्या पता समय कब आपकी जिंदगी में पीछे मुड़ कह दे,अपनी उम्मीद कायम रखीये,

जब समय खराब हो हो धैर्य रखिये,जब समय अच्छा हो तो लोगों से समानुभूति रखिये,कोई भी कभी हमेशा के लिए बड़ा या छोटा नहीं होता, वैसे भी शतरंज का खेल खत्म होने के बाद राजा और प्यादे को एक डब्बे में रख दिया जाता है,

एक बात और मुझे पता है इसको पढ़ने के बाद आप अपना व्हात्सप्प ग्रुप अवश्य चेक करेंगे,या ऐसा करने की सोच रहे है,अब आप मुस्कुरा रहे है कि अरे यार इसको कैसे पता चला, बस ऐसे ही मुस्कुराते रहिये..

लाइफ मंत्रा- गलति कहा हुई,बच्चो को सफल बनने के साथ साथ असफलता झेलने की भी ट्रेनिंग दीजिये

गड़बड़ कहाँ हुई

एक बहुत ब्रिलियंट लड़का था. सारी जिंदगी फर्स्ट आया. साइंस में हमेशा 100% स्कोर किया. अब ऐसे लड़के आम तौर पर इंजिनियर बनने चले जाते हैं, सो उसका भी सिलेक्शन IIT चेन्नई में हो गया. वहां से B Tech किया और वहां से आगे पढने अमेरिका चला गया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफ़ोर्निया से MBA किया.

अब इतना पढने के बाद तो वहां अच्छी नौकरी मिल ही जाती है. उसने वहां भी हमेशा टॉप ही किया. वहीं नौकरी करने लगा. 5 बेडरूम का घर  उसके पास. शादी यहाँ चेन्नई की ही एक बेहद खूबसूरत लड़की से हुई .

एक आदमी और क्या मांग सकता है अपने जीवन में ? पढ़ लिख के इंजिनियर बन गए, अमेरिका में सेटल हो गए, मोटी तनख्वाह की नौकरी, बीवी बच्चे, सुख ही सुख।

लेकिन दुर्भाग्य वश आज से चार साल पहले उसने वहीं अमेरिका में, सपरिवार आत्महत्या कर ली. अपनी पत्नी और बच्चों को गोली मार कर खुद को भी गोली मार ली. What went wrong? आखिर ऐसा क्या हुआ, गड़बड़ कहाँ हुई.

ये कदम उठाने से पहले उसने बाकायदा अपनी wife से discuss किया, फिर एक लम्बा suicide नोट लिखा और उसमें बाकायदा अपने इस कदम को justify किया और यहाँ तक लिखा कि यही सबसे श्रेष्ठ रास्ता था इन परिस्थितयों में. उनके इस केस को और उस suicide नोट को California Institute of Clinical Psychology ने ‘What went wrong?‘ जानने के लिए study किया .

पहले कारण क्या था , suicide नोट से और मित्रों से पता किया। अमेरिका की आर्थिक मंदी में उसकी नौकरी चली गयी. बहुत दिन खाली बैठे रहे. नौकरियां ढूंढते रहे. फिर अपनी तनख्वाह कम करते गए और फिर भी जब नौकरी न मिली, मकान की किश्त जब टूट गयी, तो सड़क पर आने की नौबत आ गयी. कुछ दिन किसी पेट्रोल पम्प पर तेल भरा बताते हैं. साल भर ये सब बर्दाश्त किया और फिर पति पत्नी ने अंत में ख़ुदकुशी कर ली...

इस case study को ऐसे conclude किया है experts ने : This man was programmed for success but he was not trained,how to handle failure. यह व्यक्ति सफलता के लिए तो तैयार था, पर इसे जीवन में ये नहीं सिखाया गया कि असफलता का सामना कैसे किया जाए.

अब उसके जीवन पर शुरू से नज़र डालते हैं. पढने में बहुत तेज़ था, हमेशा फर्स्ट ही आया. ऐसे बहुत से Parents को मैं जानता हूँ जो यही चाहते हैं कि बस उनका बच्चा हमेशा फर्स्ट ही आये, कोई गलती न हो उस से. गलती करना तो यूँ मानो कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया और इसके लिए वो सब कुछ करते हैं, हमेशा फर्स्ट आने के लिए. फिर ऐसे बच्चे चूंकि पढ़ाकू कुछ ज्यादा होते हैं सो खेल कूद, घूमना फिरना, लड़ाई झगडा, मार पीट, ऐसे पंगों का मौका कम मिलता है बेचारों को,12 th कर के निकले तो इंजीनियरिंग कॉलेज का बोझ लद गया बेचारे पर, वहां से निकले तो MBA और अभी पढ़ ही रहे थे की मोटी तनख्वाह की नौकरी. अब मोटी तनख्वाह तो बड़ी जिम्मेवारी, यानी बड़े बड़े targets.
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कमबख्त ये दुनिया , बड़ी कठोर है और ये ज़िदगी, अलग से इम्तहान लेती है. आपकी कॉलेज की डिग्री और मार्कशीट से कोई मतलब नहीं उसे. वहां कितने नंबर लिए कोई फर्क नहीं पड़ता. ये ज़िदगी अपना अलग question paper सेट करती है. और सवाल ,सब out ऑफ़ syllabus होते हैं, टेढ़े मेढ़े, ऊट पटाँग और रोज़ इम्तहान लेती है. कोई डेट sheet नहीं.
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एक अंग्रेजी उपन्यास में एक किस्सा पढ़ा था. एक मेमना अपनी माँ से दूर निकल गया. आगे जा कर पहले तो भैंसों के झुण्ड से घिर गया. उनके पैरों तले कुचले जाने से बचा किसी तरह. अभी थोडा ही आगे बढ़ा था कि एक सियार उसकी तरफ झपटा. किसी तरह झाड़ियों में घुस के जान बचाई तो सामने से भेड़िये आते दिखे. बहुत देर वहीं झाड़ियों में दुबका रहा, किसी तरह माँ के पास वापस पहुंचा तो बोला, माँ, वहां तो बहुत खतरनाक जंगल है. Mom, there is a jungle out there.
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*इस खतरनाक जंगल में जिंदा बचे रहने की ट्रेनिंग बच्चों को अवश्य दीजिये*.।
बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार भी देना जरूरी है  ,हर परिस्थिति को ख़ुशी ख़ुशी धैर्य के साथ झेलने की क्षमता, और उससे उबरने का ज्ञान और विवेक बच्चों में होना ज़रूरी है।माता पिता सफल जीवन के लिए तितिक्षा की शिक्षा अवश्य दें ।

Monday, 1 October 2018

गांधी जयंती

सभी अंध और मजबूर गांधीवादियों से खेद सहित
गांधी जयंती पर विशेष कविता

महात्मा गांधी जब तक जीवित थे तब तक स्वयं सियासत थे और मरने के बाद एक सियासत का मुद्दा है, ये हर भारतीय राजनितज्ञ की राजनितिक मज़बूरी है कि वो उनके विरोध में नहीं बोल सकता,लेकिन मैं क्योकि राजनितिक निरपेक्ष हु इसलिए आप सभी को सच से सामना अवश्य करवाना चाहूंगा...

कितने झूले थे फ़ासी पर कितनो ने गोली खायी थी,
क्यों झूठ बोलते होसाहेब,की आजादी बस चरखे से आयी थी,

चढ़ गये न जाने कितने फ़ासी पर फिर भी उनके होठ मौन थे,
अगर आजादी बस गांधी लाये थे तो बताओ भगत सिंग कौन थे,

किस अंहिंसा की बात करते हो तुम,तुम्हारे एक निर्णय से सारा देश बरसो तक सिसका था,
ट्रेन भर कर आई थी लाशें,विभाजन पे जो लाखो का खून बहा  था बताओ वो खून  किसका था,

अगर अहिंसा के पुजारी को देश अगर इतना ही प्यारा था,
तो फिर उसने क्यों विभाजन स्वीकारा था,

2 अक्टूबर पर गर्व है मुझको इसलिए नहीं की इस दिन गांधी का जन्म हुआ,
ये महापर्व है क्योकि जय जवान जय किसान कहने वाले शास्त्री जी का अवतरण हुआ

कभी सोचिये, टटोलिये अपने आप को क्या इसी को इन्साफ कहते है,
भारतमाता को विभाजित करने वाले को आज हम देश का बाप कहते है,

विकाश खेमका
कांटाबांजी

Saturday, 29 September 2018

The concept of veda

I loved the concept:
There are four yugas widely accepted in Hinduism. They are :
1. Satya yug
2. Treta yug (Ramayana)
3. Dwapara yug(Mahabharata)
4. Kal yug(Present)

In Satya yug, the fight was between two worlds (Devalok & Asuralok). Asuralok being the evil, was a different WORLD.

In Treta yug, the fight was between Rama and Ravana. Both rulers from two different COUNTRIES.

In Dwapara yug, the fight was between Pandavas and Kauravas. Both good and evil from the SAME FAMILY.

Kindly note how the evil is getting closer. For example, from a DIFFERENT WORLD to a DIFFERENT COUNTRY to the SAME FAMILY.

Now, know where is the evil in Kaliyug???

It is inside us. Both GOOD AND EVIL LIVE WITHIN. The battle is within us. Who will we give victory to, our inner goodness or the evil within??

Think, identify and fight. 👍Happy Navaratri 🙏

औरत और समाज

औरत को आईने में यूं उलझा दिया गया,
*बखान करके हुस्न का बहला दिया गया*

ना हक दिया ज़मीन का न घर कहीं दिया,
*गृहस्वामिनी के नाम का रुतबा दिया गया*

छूती रही जब पांव परमेश्वर पति को कह,
*फिर कैसे इनको घर की गृहलक्ष्मी बना दिया*

चलती रहे चक्की और जलता रहे चूल्हा,
*बस इसलिए औरत को अन्नपूर्णा बना दिया*

न बराबर का हक मिले न चूँ ही कर सकें,
*इसलिए इनको पूज्य देवी दुर्गा बना दिया*

यह डॉक्टर इंजीनियर सैनिक भी हो गईं,
*पर घर के चूल्हों ने उसे औरत बना दिया*

चाँदी सोने की हथकड़ी, नकेल, बेड़ियां,
*कंगन, पांजेब, नथनियां जेवर बना दिया*

व्यभिचार लार आदमी जब रोक ना सका,
*शृंगार, साज, वस्त्र पर तोहमत लगा दिया*

खुद नंग धड़ंग आदमी घूमता है रात दिन,
*औरत की टांग क्या दिखी नंगा बता दिया*

नारी ने जो ललकारा इस दानव प्रवृत्ति को,
*जिह्वा निकाल रक्त प्रिय काली बना दिया*

नौ माह खून सींच के बचपन जवां किया,
*बेटों को नाम बाप का चिपका दिया गया*
💐👸💃   📚🙏