Wednesday, 30 September 2015

सामजिक संस्था के नियम

किसी भी सामाजिक संस्था के कुछ ख़ास बाते जो आपको बहुत काम काम आएगी

1.आप कुछ नहीं करंगे तो आप को कोई कुछ नहीं कहेगा

2.आप अगर सक्रीय है तो हमेशा आप पर उंगलिया उठेगी

3.अगर आप ये नहीं सोचेंगे की श्रेय किसको मिलेगा तो आप बहुत कुछ कर सकते है

4.आपके जितना विरोध सह सकेंगे आपका उतना ज्यादा  सम्मान होगा

5.आप जितना ज्यादा काम करेंगे  उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा

6.जिम्मेदारी उसी की तरफ खींची आती ही जो उन्हें उठाना चाहता है

7.आप अपने स्वच्छा से जो भी प्रोजेक्ट करेंगे उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी

8.जो आपका सबसे अच्छा  हितैसी है वो आपके मुह पर आपकी आलोचना करेगा

9.आप को प्रशंशा जब मिलेगी जब आप उसकी अपेक्षा करना बंद कर देंगे

10.आप लोकप्रिय तब होंगे जब अपने साथियो के कार्य को सराहेंगे और उनका उत्साह बढ़ाएंगे

11.आप कब सही थे कोई याद नहीं रखेगा,आप कब गलत थे कोई नहीं भूलेगा

12.आप जितना नियम मान कर चलेंगे आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जाएगा

13.सिर्फ धन देकर आप किसी संस्था में बहुत ज्यादा सम्मान नहीं पा सकते उसके लिए समय और समर्पण भी आवश्यक है

14. किसी बात का विरोध भी क़िया जाए और किसी को ख़राब भी न लगे ये संभव नहीं है..

15.अगर आप समझते है की आप के द्वारा किया गया काम और बेहतर हो सकता था तो आप दोषी है अपना शतप्रतिशत योगदान न देने के..

सबसे ख़ास बात सामाजिक कार्यो का उद्देश्य मन की संतुष्टि होता है
और इस के लिए बहुत कुछ सहना होता है और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं है..

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Wednesday, 26 August 2015

अग्रवाल समाज में महिलाओ की सहभागिता

अग्र समाज हमेशा से ही समाजवाद का आदर्श उदाहरण रहा है..इसमें परस्पर सहयोग और मिलन की भावना जो है वो बहुत ही कम समाजो में देखने को मिली है..समानता का जो अधिकार इस समाज में  है वो शायद किसी और समाज में हो सकता है..

इस समाजवाद के राह पर चलते हुए हमें सदियो से अपनी संस्कृति पर गर्व करते आये है..

मगर बदलते परिवेश के साथ ये महसूस किया गया है की  इसमें कुछ बदलाव की जरूरत है..
अग्रसमाज आज भी पुरुष प्रधान ही रहा है..
इसका ज्वलन्त उदाहरण किसी भी अग्रवाल सभा को ही ले ले जहा महिलाओ की भागीदारी शून्य है..

क्या आपको नहीं लगता कि महिलाये भी अग्रवाल समाज का ही हिस्सा है तो उन्हें समानता के अधिकार के चलते अग्रवाल सभा में प्रतिनिधित्व दिया जाना चहिये,

ठीक है इसमें कुछ व्यवहारिक असुविधाएं (जैसे देर रात्रि की संभा में सहभागिता,दौरे,इत्यादि) हो सकती है , मगर क्या हमें खुद से आगे बढ़कर एक उदाहरण प्रस्तुत करने के जरुरत नहीं है की अग्रवाल समाज में महिलाओ को समानता का अधिकार है,

हो सकता है इस विषय पर एक राय न बन पाये विरोध भी हो,मगर किसी भो समाज की उननति में महिलाओ की सहभागिता बहुत जरुरी है..और ये सकारात्मक प्रारम्भ हम खुद कर के एक ऐतिहासिक कदम उठा सकते है...

आज जहा देश में महिला आरक्षण और उनके सामान अधिकारो की बात होती है अपने समाज में जो की समाजवाद का उत्कृष्ट नमूना है उसमे ये पहल अवश्य करनि चाहिए,
आज महिला शसक्तीकरण के युग में इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है....

आज जब हमारे समाज की महिलाये और युवतियां ca ,डॉ,इंजिनीरिंग ,ias,बनकर समाज के हर क्षेत्र में कार्यरत है तो हम उन्हें अपने ही समाज में सक्रीय होने के अधिकार से क्यों  रोक रहे है??

शास्त्रो में भी कहा गया है की "जहा महिलाओ का सम्मान होता है वहा देवता निवास करते है"

हम अग्रवंश के वंसज अपने इष्ट देवी श्री लक्षमी जी को मानते है जो की महिला स्वरुप में हमेशा हमारे पास  विराजमान रहे ऐसे कामना की जाती है फिर महिला समाज को अपनी सभाओ में सहभागिता देने में ये भेदभाव क्यों???

ये बात सही है की जहा तक मेरी जानकारी है कभी भी किसी महिला संगठन ने ये बात नहीं उठाई है ,मगर क्या इससे हमारा दायित्व उनके प्रति ख़त्म हो जाता है,अगर उन्होंने आज तक अपना हक़ माँगा नहीं है तो क्या ये हमारी नैतिक जिम्मेदारी नहीं की हम खुद उनको उनका हक़ दे,

अब ये आपके ऊपर है की आप पुरुषप्रधान समाज का अहकारमयी वातावरण चाहते है या समानता का अधिकार वाला ममतामयी वातावरण....

सोच आपकी
फैसला आपका,

Tuesday, 18 August 2015

दृश्यम

कल "दृश्यम " फ़िल्म देखि,
फ़िल्म का  कॉन्सेप्ट है इनसान का मनोविज्ञान है की  देखि हुई  मेमोरी सबसे मजबूत होती है और ये सब मेमोरी पर भारी होती है,
हम बाकी इंद्रिया जैसे कान,नाक, स्पर्श,इत्यादि की याददास्त सीमित होती है, इन सब के मुकाबले देखि हुई चीजे बहुत लंबे समय तक याद  तरही है, उदाहरण के तौर पर हमें पढ़ी हुई चीजे बहुत दिनों तक याद रहती है क्योकि इस में हमें उस चीज को देख कर पढते है, टीवी का ऐड रेडियो के ऐड से 10 गुना महंगा होता है क्योकि देखि हुई यादो को अनदेखा करना बहुत मुश्किल होता है,

कहने का मतलब ये है की हम या हमारा स्वाभाव ,हमारी आदते बहुत कुछ इस पर निर्भर करती है की हम रोज क्या देखते है,

यही सोच अपने बच्चों पर लागु कर के देखिये,
आज हर किसी को ये शिकायत है की उनका बच्चा लापरवाह है,गैर जिम्मेदार है,आलासि है, स्वार्थी है,झूठ बोलता है या कुछ न कुंछ थोड़ी हो या ज्यादा शिकायत सब से है,

हम तो रोज अपने बच्चों को अच्छी  शिक्षा देते है  की अच्छे इंसान बनो,अच्छे काम करो, झूठ मत बोलो, तो फिर वो ये सब कहा से सिख रहे है,

बाल मन एक कोरा पन्ना होता है ये वही सीखता है जो वो देखता  है,अपने बच्चों के सामने हम खुद झूठ बोलकर हम उन को हम खुद झूठ बोलना सिखाते है,
उनके समाने अपने कर्तव्यों से भागकर हम खुद उन्हें गैर जिम्मेदार बनाते है,उनके सामने दुसरो की बुराई कर के उनको बुराई करना सिखाते है,

अनजाने में ही हमारी कथनी और करनी में इतना फर्क है की बच्चा वो ही सीखता है जो वो देखता है वो नहीं जो हम कहते है,

कोशिश कीजिये की ये विरोधभास बच्चों के सामने न हो,बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए  उन्हें एक अच्छी सिख देने के बजाय एक अच्छा उदाहरण बन कर देखिये,

शायद अपने बच्चों से आपकी शिकायते कुछ कम हो जाये...

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धनयवाद,
विकाश खेमका,
उपाध्यक्ष
मारवाड़ी युवा मंच,कांटाबांजी

Sunday, 12 July 2015

जिंदगी के मायने,रतन टाटा द्वारा

सिर्फ अपने कैरियर या बिज़नस ऐ जुड़े लक्ष्य निर्धारित न करे,बल्कि अपनी जिंदगी में सामाजिक,पारिवारिज और व्यवहारिक चीजो के साथ सामन्जस्य बैठा कर अपना लक्ष्य  निर्धरित  करे,
सिर्फ आर्थिक लक्ष्य को हासिल कर लेना प्रगति नहीं,आपके प्रमोशन वाले दिन आगर आपका ब्रेक अप हो जाता है तो प्रमोशन का क्या मतलब है,अगर आपकी नयी गाडी की सीट में बैठने से आपको पीठ दर्द होता है तो क्या लाभ,जिंदगी को इतना सीरियस लेने की कोई जरुरत नहीं है यहाँ से ज़िंदा बच कर कोई नहीं जाएगा,हमारे पास अभी के हिसाब से ज्यादा से ज्यादा  से ज्यादा 50 साल या सिर्फ 2500 हफ्ता जिएंगे
हम यहाँ एक प्रीपेड कार्ड की तरह है जिसकी वैलिडिटी से पहले हमें इसको उपयोग करना सीखना होगा,

कभी कॉलेज से एकाध क्लास बंक कर के भी देखिये,कभी अपनी पत्नी से छोटा मोटा झगड़ा कर के देखिये,कभी अपने बचचों के साथ खेल कर भी देखिये,किसी से प्यार कर के देखिये
आज से 25 साल बाद कालेज की डिग्रियां,या कमाया हुआ पैसा इतना मजा नहीं देगा,जितना मजा कालेज   बंक की हुई क्लास क्लास की और बच्चों के साथ बिठाये हुए पल की यादे देंगी,
हम कोई प्रोग्राम किये हुए कंप्यूटर नहीं है,भावनाओ से संचालिक होने वाले इंसान है,

उन्नति बहुत जरुरी है मगर हर क्षेत्र् में  संतुलन ज्यादा  जरूरी है,

जिंदगी तो आपकी जिंदगी भर मजे लेगी,कभी आप भी जिंदगी के मजे लेकर देखिये

रतन टाटा द्वारा कुछ दिन पहले दिए गए व्याख्यान का हिंदी अनुवाद,
सुप्रभात्

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Monday, 6 July 2015

पत्नी से झगड़ा क्यों करे

पत्नी से झगडे करने के फायदे..
1.नींद में कोई व्यवधान नहीं आता,(सुन रहे हो क्या, लाइट बंद करो,पंखा बंद करो,चद्दर इधर दो,इधर मुह करो, टाइप कुछ भी बाते नहीं होती)

2. पैसे की बचत-जब पत्नी से झगड़ा हुए रहता है तब पत्नी पैसे नहीं मांगती,

3.तनाव से मुक्ति- झगड़े के दैरान बात चीत बंद होती है जिससे कीच कीच कम होता है और तनाव से मुक्त रहता है,

4-आत्मनिर्भरता आती है-जो अपना  काम आप कर सकते है वो इसलिए नहीं करते की आपकी पत्नी कर देती है,जो झगड़े के बाद वो छोटे मोठे काम (खुद ले कर पानी पीना,नहाने के बाद अपने कपड खुद निकालना,अपने लिए खुद चाय बनाना,) खुद कर के आदमी आत्मनिर्भर हो जाता है,

5-काम में व्यवधान नहीं होता- झगडे के दौरान काम के समय आपको पत्नी के फ़ालतू कॉल (जानू क्या कर रहे हो,मन नहीं लग रहाहै, आज बहुत गर्मी है, इस प्रकार के) नहीं आते,जिससे आप अपने काम में ध्यान केंद्रित कर सकते है,

6- घर जल्दी जाने की चिंता से मुक्ति-( अधिकांश पतियो को काम के बाद जल्दी घर आने के लिए घर से बारम्बार फ़ोन आते है मगर एक बार झगड़ा हो जाने के बाद आप कुछ दिन तक इस चिंता से दूर रह सकते है,

7- आप का मूल्य बढ़ता है-ये इंसान का मनोविज्ञान है की जो चीज नहीं होती उसके मूल्य का अहसास तभी होता है,झगडे के दौरान पत्नी को आपकी मूल्य का अहसास होता है

8-प्यार बढ़ता है-आपस में झगडे से प्यार बढ़ता है,क्योकि अक्सर देखा गया है एक बार बारिश हो  जाए तो मौसम सुहाना हो जाता है..

और भी फायदे है,
मगर समयाभाव के कारण लिखना मुश्किल है

तो आइये प्रण ले की आज के बाद हम सभी पति महीने में एक न एक बार अपनी पत्नी से झगड़ा जरूर करेगे(पत्नी तो हमेसा तैयार है) ताकि महीने में कुछ दिन हम भी शांति से गुजार सके,

पति हित में जारी

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Thursday, 12 February 2015

सुख,शांति और संतुष्टि

uकल मेरे मोबाइल का इयरफोन ख़राब था,मगर गाना सुनने की इच्छा बलवत थी तो मैंने अलमारी से ढूंढ के अपना सोनी का आई पेड़ निकाला और गाना सुनने लगा,

अचानक मुझे ध्यान आया की पिछले 2 सालो से मैंने इसका उपयोग नहीं किया है,और खरीदने के बाद से 3-4 बार ही यूज़ किया है,
मैंने ऐसी चीजो की लिस्ट मन में तैयार की,मेरा हैंडीकैम लगभग 18 महिने पहले use हुआ था,टेबलेट 1साल से सिर्फ बच्चे सन्डे को use करते है,
अलमारी में कपडे 80 %ऐसे है जिनका नंबर लगे साल भर ही गगये,

कुल मिला कर हर तरफ से ये महसूस हुआ की बहुत सी  चीजे सिर्फ खरीद ली गई है सब कुछ है बस संतोष नहीं है,अभी भी मन उन चीजो की तरफ लालायित होता है जो नहीं है,मै इतना कुछ पाकर भी खुस नहीं हु क्यों??
आज भी मेरी आय भारत के 90% लोगों से ज्यादा है,मगर मैं खुस नहीं हु,कुछ कमी सी है,

आखिर समस्या क्या है की मैं और मेरे जैसे कितने ही लोग सब साधन संपन्न होते हुए भी खुश नहीं है,चिंतित है,चिड़चिड़े है,

सोचा तो पाया की हम उन चीजो के भागते है जिनकी हमें जरुरत ही नहीं है,हा हमको एक आराम दायक गाड़ी की जरुरत है और हम इसके लिये सक्षम भी है मगर हमारी सोच है की वो गाडी इंडिका न ही होंडा सिटी हो,अगर मै होंडा सिटी खरीदने लायक हु तो मुझे हौंडा सिटी नहीं स्कोडा चाहिए,

घर में टीवी नहीं एलसीडी चाहिए 32 इंच वाला,
स्मार्ट फ़ोन चाहिए तो एप्पल का,

42 rs की undeewear नहीं 168 की जॉकी की अंडरवियर की ,

हमने आपने आप को या कहे की विज्ञापन गुरुओ ने हमारी सोच को इस तरह मोड़ दिया है की
बिना a c के हम व्याकुल हो जाते है,
बिना r o का पानी  पि कर हम बीमार ही जाते है

जिंदगी की जरुरी चीजे हमारे पास है,आराम दयाक चीजे हम अफ़्फोर्ड कर सकते है मगर लक्ज़री की ख्वाहिश में हम आराम का मजा भी छोड़ रहे है,

उस चीज के ख्वाहिश में जो हमारे पास नहीं है इस चीज को भूल रहे है जो हमारे पास है

हम ये भूल रहे हैं की
जो चीज चाहो उसे पाना सफलता है,और जो पाओ उसे चाहना खुशी है,
मये सब लिखने का कारण ये है की आज हमारे समाज में कमी किसी की नहीं,मगर
और जुयादा और ज्यादा  की लालसा में क्या हैम अपने जीवन का मजा नहीं ख़राब कर रहे,

ये धरती जरूरते सबकी पूरा कर सकती है मगर लालच किसी एक का भी नहीं,
आज हमें वो हर वो चीज चाहिए जिसे आप अपने आयास पास देखते है इसलिए नही की क्योकि आप को उस चीज की जरुरत है इसलिए की उस चीज का न होना आपके सामाजित स्तर को प्रभावित करता है।
ये social status को मेन्टेन करने के फेर में हम उन चीजो का मजा भी खो देते है जो हमारे पास है...
जिंदगी को इतना सीरियसली लेने की कोई जरुरत नहीं है
यहाँ से ज़िंदा बच के कोई नहीं जायेगा

बस जो है उसे एन्जॉय करो..
जो चाहते हो उसे पाने का प्रयास करो
जो मिल जाए उससे संतोष करो

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Monday, 26 January 2015

हमारी देशभक्ति???

सभी साथियो को 66 तम गणतंत्र दिवस की हार्दिक सुभकामनाये

मित्रो

आज से 65 वर्ष पूर्व इस हमारे इस भारत देश में संविधान
लागु हुआ था,1948 में आजदी मिलने के बाद भारत
अगर सही मायने में आज लोकतंत्र
बना था,आज के दिन को पालन करने का मूल कारन ये
है की आज आपको हमको एक आम आदमी को अपने
मौलिक अधिकार मिले थे, आज के दिन
सत्ता सही मायने में आम आदमियो के हाथ में
आयी थी,मगर मित्रों जहा अधिकार होता है
वहां कर्तव्य भी होता है,हैम आज अपने अधिकारो पर
हक़ तो याद रहते है, पर अपने कर्तव्य भूल जाते है, उनके
प्रति अपना उतरदायित्व नहीं निभाते, ,सिर्फ 15
अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहरा भर देने से हैम
देसभक्त नहीं ही जाते,हमें देश के विकाश के लिए कुछ
भी योगदान देना है,मै नहीं कहता की हर आदमी देश
के लिए जान दे सकता है,मगर इतना तो कर सकता है
की अपना कचरा ढंग से सही जगह डाल सकता है, हर
आदमी देश के प्रतिनिधित्व के लिए चुनाव नहीं लड़
सकता मगर बिना किसी प्रलोभन के अच्छे
प्रत्याशी को चुन कर आप अपने देश का विकाश में
सहयोग कर सकते है,
मैं ये नहीं कहता की देशके लिए
अपनी सारी पूंजी दान दे दीजिये ,
मगर किसी एक जरुरत मंद की मदद तो आप कर ही सकते
है,
आप का एक छोटा सा सहयोग बहुत बड़ा परवर्तन
ला सकता है,
125 करोड़ की आबादी वाले देश में अगर सब सिर्फ 1
रूपए कई भी मदद करे तो देश को बदल देने
का माद्दा रखते है,
बस इतना कहना है की तिरगे के प्रति जो सम्मान 15
अगस्त और 26 जन को उमड़ता है उसे साल के
बाकी 363 दिन भी बनाये रखे,
झंडा ऊँचा बड़े बड़े खुटे में लगा के फहराने से नहीं ,अपने
दिल में बसाने से होगा,
जय हिन्द,जय भारत,

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