Thursday, 12 February 2015

सुख,शांति और संतुष्टि

uकल मेरे मोबाइल का इयरफोन ख़राब था,मगर गाना सुनने की इच्छा बलवत थी तो मैंने अलमारी से ढूंढ के अपना सोनी का आई पेड़ निकाला और गाना सुनने लगा,

अचानक मुझे ध्यान आया की पिछले 2 सालो से मैंने इसका उपयोग नहीं किया है,और खरीदने के बाद से 3-4 बार ही यूज़ किया है,
मैंने ऐसी चीजो की लिस्ट मन में तैयार की,मेरा हैंडीकैम लगभग 18 महिने पहले use हुआ था,टेबलेट 1साल से सिर्फ बच्चे सन्डे को use करते है,
अलमारी में कपडे 80 %ऐसे है जिनका नंबर लगे साल भर ही गगये,

कुल मिला कर हर तरफ से ये महसूस हुआ की बहुत सी  चीजे सिर्फ खरीद ली गई है सब कुछ है बस संतोष नहीं है,अभी भी मन उन चीजो की तरफ लालायित होता है जो नहीं है,मै इतना कुछ पाकर भी खुस नहीं हु क्यों??
आज भी मेरी आय भारत के 90% लोगों से ज्यादा है,मगर मैं खुस नहीं हु,कुछ कमी सी है,

आखिर समस्या क्या है की मैं और मेरे जैसे कितने ही लोग सब साधन संपन्न होते हुए भी खुश नहीं है,चिंतित है,चिड़चिड़े है,

सोचा तो पाया की हम उन चीजो के भागते है जिनकी हमें जरुरत ही नहीं है,हा हमको एक आराम दायक गाड़ी की जरुरत है और हम इसके लिये सक्षम भी है मगर हमारी सोच है की वो गाडी इंडिका न ही होंडा सिटी हो,अगर मै होंडा सिटी खरीदने लायक हु तो मुझे हौंडा सिटी नहीं स्कोडा चाहिए,

घर में टीवी नहीं एलसीडी चाहिए 32 इंच वाला,
स्मार्ट फ़ोन चाहिए तो एप्पल का,

42 rs की undeewear नहीं 168 की जॉकी की अंडरवियर की ,

हमने आपने आप को या कहे की विज्ञापन गुरुओ ने हमारी सोच को इस तरह मोड़ दिया है की
बिना a c के हम व्याकुल हो जाते है,
बिना r o का पानी  पि कर हम बीमार ही जाते है

जिंदगी की जरुरी चीजे हमारे पास है,आराम दयाक चीजे हम अफ़्फोर्ड कर सकते है मगर लक्ज़री की ख्वाहिश में हम आराम का मजा भी छोड़ रहे है,

उस चीज के ख्वाहिश में जो हमारे पास नहीं है इस चीज को भूल रहे है जो हमारे पास है

हम ये भूल रहे हैं की
जो चीज चाहो उसे पाना सफलता है,और जो पाओ उसे चाहना खुशी है,
मये सब लिखने का कारण ये है की आज हमारे समाज में कमी किसी की नहीं,मगर
और जुयादा और ज्यादा  की लालसा में क्या हैम अपने जीवन का मजा नहीं ख़राब कर रहे,

ये धरती जरूरते सबकी पूरा कर सकती है मगर लालच किसी एक का भी नहीं,
आज हमें वो हर वो चीज चाहिए जिसे आप अपने आयास पास देखते है इसलिए नही की क्योकि आप को उस चीज की जरुरत है इसलिए की उस चीज का न होना आपके सामाजित स्तर को प्रभावित करता है।
ये social status को मेन्टेन करने के फेर में हम उन चीजो का मजा भी खो देते है जो हमारे पास है...
जिंदगी को इतना सीरियसली लेने की कोई जरुरत नहीं है
यहाँ से ज़िंदा बच के कोई नहीं जायेगा

बस जो है उसे एन्जॉय करो..
जो चाहते हो उसे पाने का प्रयास करो
जो मिल जाए उससे संतोष करो

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Monday, 26 January 2015

हमारी देशभक्ति???

सभी साथियो को 66 तम गणतंत्र दिवस की हार्दिक सुभकामनाये

मित्रो

आज से 65 वर्ष पूर्व इस हमारे इस भारत देश में संविधान
लागु हुआ था,1948 में आजदी मिलने के बाद भारत
अगर सही मायने में आज लोकतंत्र
बना था,आज के दिन को पालन करने का मूल कारन ये
है की आज आपको हमको एक आम आदमी को अपने
मौलिक अधिकार मिले थे, आज के दिन
सत्ता सही मायने में आम आदमियो के हाथ में
आयी थी,मगर मित्रों जहा अधिकार होता है
वहां कर्तव्य भी होता है,हैम आज अपने अधिकारो पर
हक़ तो याद रहते है, पर अपने कर्तव्य भूल जाते है, उनके
प्रति अपना उतरदायित्व नहीं निभाते, ,सिर्फ 15
अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहरा भर देने से हैम
देसभक्त नहीं ही जाते,हमें देश के विकाश के लिए कुछ
भी योगदान देना है,मै नहीं कहता की हर आदमी देश
के लिए जान दे सकता है,मगर इतना तो कर सकता है
की अपना कचरा ढंग से सही जगह डाल सकता है, हर
आदमी देश के प्रतिनिधित्व के लिए चुनाव नहीं लड़
सकता मगर बिना किसी प्रलोभन के अच्छे
प्रत्याशी को चुन कर आप अपने देश का विकाश में
सहयोग कर सकते है,
मैं ये नहीं कहता की देशके लिए
अपनी सारी पूंजी दान दे दीजिये ,
मगर किसी एक जरुरत मंद की मदद तो आप कर ही सकते
है,
आप का एक छोटा सा सहयोग बहुत बड़ा परवर्तन
ला सकता है,
125 करोड़ की आबादी वाले देश में अगर सब सिर्फ 1
रूपए कई भी मदद करे तो देश को बदल देने
का माद्दा रखते है,
बस इतना कहना है की तिरगे के प्रति जो सम्मान 15
अगस्त और 26 जन को उमड़ता है उसे साल के
बाकी 363 दिन भी बनाये रखे,
झंडा ऊँचा बड़े बड़े खुटे में लगा के फहराने से नहीं ,अपने
दिल में बसाने से होगा,
जय हिन्द,जय भारत,

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Saturday, 27 December 2014

संयुक्त परिवार

��
बहुत सुँदर पंक्तियाँ-

वो पंगत में बैठ के
निवालों का तोड़ना,
वो अपनों की संगत में
रिश्तों का जोडना,

वो दादा की लाठी पकड़
गलियों में घूमना,
वो दादी का बलैया लेना
और माथे को चूमना,

सोते वक्त दादी पुराने
किस्से कहानी कहती थीं,
आंख खुलते ही माँ की
आरती सुनाई देती थी,

इंसान खुद से दूर
अब होता जा रहा है, 
वो संयुक्त परिवार का दौर
अब खोता जा रहा है।

माली अपने हाथ से
हर बीज बोता था, 
घर ही अपने आप में
पाठशाला होता था,

संस्कार और संस्कृति
रग रग में बसते थे,
उस दौर में हम
मुस्कुराते नहीं
खुल कर हंसते थे।

मनोरंजन के कई साधन
आज हमारे पास है, 
पर ये निर्जीव है
इनमें नहीं साँस है,

फैशन के इस दौर में
युवा वर्ग बह गया,
राजस्थान से रिश्ता बस
जात जडूले का रह गया।

ऊँट आज की पीढ़ी को
डायनासोर जैसा लगता है,
आँख बंद कर वह
बाजरे को चखता है।

आज गरमी में एसी
और जाड़े में हीटर है,
और रिश्तों को
मापने के लिये
स्वार्थ का मीटर है।
      
वो समृद्ध नहीं थे फिर भी
दस दस को पालते थे,   
खुद ठिठुरते रहते और
कम्बल बच्चों पर डालते थे।

मंदिर में हाथ जोड़ तो
रोज सर झुकाते हैं,
पर माता-पिता के धोक खाने
होली दीवाली जाते हैं।

मैं आज की युवा पीढी को
इक बात बताना चाहूँगा, 
उनके अंत:मन में एक
दीप जलाना चाहूँगा

ईश्वर ने जिसे जोड़ा है
उसे तोड़ना ठीक नहीं,
ये रिश्ते हमारी जागीर हैं
ये कोई भीख नहीं।

अपनों के बीच की दूरी
अब सारी मिटा लो,
रिश्तों की दरार अब भर लो
उन्हें फिर से गले लगा लो।

अपने आप से
सारी उम्र नज़रें चुराओगे,
अपनों के ना हुए तो
किसी के ना हो पाओगे
सब कुछ भले ही मिल जाए
पर अपना अस्तित्व गँवाओगे

बुजुर्गों की छत्र छाया में ही
महफूज रह पाओगे।
होली बेईमानी होगी
दीपावली झूठी होगी,
अगर पिता दुखी होगा
और माँ रूठी होगी।।

अन्तःकरण को छूने वाली है ये कविता

जिसने भी लिखी मेरा प्रणाम

एक विनती अपने समाज से

मारवाड़ी समाज हमेशा से ही धन का श्रोत रहा है
श्री लष्मी जी कीे मरवाड़ी समाज पर विशेष कृपा रही है क्योकि मारवाड़ी समाज प्रारम्भ से ही परिश्रमी दृढ संकल्प और अपने कार्य के प्रति समर्पित रहा है
आज भी देश के व्यवसाय में एक बड़ी संख्या मारवाड़ियों की है

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य ये है की हम सुरुवात से ही लष्मीपुत्र है

देश के कोने कोने में हम बसे है
देश के कोई ऐसा कोना नहीं जहा कोई मारवाड़ी भाई न रहता हो
हमारे सहनशक्ति उद्यम विपरीत परिस्थियों में भी कार्य करने की क्षमता के कारन देश के हर कोने में हमारी समृद्धि का डंका बजता है

और हमने ही देश में अनेक गौशाला धर्मशाला मंदिर और पानी प्याऊ इत्यादि बनाकर विशेष रूप से सामाजिकता और सहृदयता का परिचय दिया है

अगर कोई मारवाड़ी धन कमाने के लिए जाना जाता है तो दान देने के लिए भी जाना जाता है

मगर पिछले कुछ वर्षो से मैं महसुस कर रहा हु की आज मारवाड़ी समाज में ज्यदातर लोग झुठे विज्ञापनो के प्रलोभन झूठी शान  और दिखावे की खातिर अपने रहन में बहुत ही ज्यादा खर्च करते हुए दान की परंपरा से दूर होते जा रहे है

हम भामाशाह के वंसज अपने मूल दान धर्म को भूल कर सिर्फ दिखावे और पतन की और अग्रसर हो रहे है

विवाह और अनेक शुभ अवसरों पर हमारे  फालतू खर्च बढ़ते ही जा रहे है
विवाह में भोजन और नाना प्रकार के आडंबर कर के हम अपनी आप को अर्थ दंड तो देते है है साथ ही समाज को बांटते भी है

हम अनजाने में ही अपने और अपने से छोटे वर्ग के लोगो में हिन् भावना का संचार करते है

आलिशान शादियों
फिजूल खर्च
दूसरे दिन  गंज भर कर पड़े हुए  अन्न के अपमान पर हमें  शर्म नहीं आती

क्या यही हमारी संस्कृति है
मै तो हमारी वो संस्कृति से परिचित था जहा अन्न को अनापूर्ना देवी माना जाता है

कृपया इस विषय में ध्यान दे

की हम पुरखो से चली आरही अग्र वंश के गर्व को नष्ट करने की और अग्रसर न हो।

अपने घर की आलीशान शादियो
बजाय किसी जरुरत मंद को मदद पहुचे तो क्या ये ज्यादा तर्क सांगत और ज्यादा न्याय सांगत नहीं होगा

मेरी आपसे विनती है की आप अपने कार्याकाल में इस सामाजिक कुप्रथा  के विरोध में कुछ कदम उठाये

ये एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है जिस पर हमारी आने पीढ़ियों का सामजिक परिदृश्य निर्भर करता ह की हम अपने आने वाली नस्ल को किस परिवेश में देखना चाहते है

मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विस्वाश है की आप इस  सामजिक पतन के मुद्दे को हल करने में अपने विवेक और अनुभव का पूरा इतेमाल करेंगे।

और अपने आने वाले इस तरह के आयोजन में झूठे आडंबरो को तिलांजलि देकर एक स्वस्थ और नयी परमपरा की सुरुआत करेंग

धन्यवाद।े

जुगाड़

कल ठण्ड बहुत थी मन पर काबू नहीं हो रहा था ऐसी ठण्ड में मन में विचार आया की ऐसी ठण्ड में अगर "ठुकाई "का इंतेजाम हो जाये तो मजा आ जाये बस फिर क्या था इसके बाद तो मन पे काबू रखना मुश्किल था।
फ़ोन निकाला अपने प्रिय दोस्तों को फ़ोन किया और "जुगाड़" में महारथ हासिल उन प्रिय मित्रो की मदद से  सारी व्ययसथा कर ली ।3000 रिपये में बात फाइनल हुई।आने वाले मजे के जोश  को दुगना करने के लिए में एक बोतल ब्लैंडर प्राइड भी 800 की ले ली साथ में कुछ चकना जरुरी था तो 100-150 चखना की भेट चढ़ गया

मगर जो आनंद प्रात होने वाला था वो इसके आगे नगण्य था

अपने आप को आंदोलित सा महसूस कार्य हुआ मै अपने प्रिय मित्रो के साथ अपने जुगाड़ के शिकार की और ।

ठण्ड ज्यादा थी इसलिए बाइक की जगह कार ले ली ।

और कार तेजी से अपनी मंजिल की और बढ़ने  लगी ।

अचानक मेरे मब में उठी इस आनंद की गति को जसै ब्रेक लग गया

गाड़ी जब फूटपाथ से गुजरी तो  मैंने देखा की कुछ लोग इस कड़कडटी ठण्ड में गठरी से बने हुए नगे बदन फुटपाथ प सोये है

मैंने कोट पहन रखा था गाड़ी में शीशे चढ़ाये हुए थे और फिर भी ठण्ड से बुरा हाल था और वो सब नंगे बदन कठोर फूटपाथ पर पड़े थे ये  देखकर मेरे सरीर ने एक झुरझुरि ली ।

मैं गाड़ी से उतरा ।उनके पास पहुचा और अपनी जेब में हाथ डाला हिसाब किये कुल 3000 रूपये थे  हिसाब किताब किया तो लगा की इतने रूपये से इन सब के लिये कम्बल का इंतेजाम किया जा सकता था । मेरे कदम कम्बल की दूकान की और बढ़ चले रस्ते में मेरे मन और दोस्तों ने कई आवाजे दी की रुक जा तू क्या कर रहा है तू आज रात का जुगाड़ ख़राब कर रहा है पागल हो गया है क्या

मगर उस समय शायद मैं बहरा हो गया था

मैंने कमबल ख़रीदे और उन गरीब नंगे बदन वालो कोढक दिया

मेरे दोस्त मुझे वही छोड़ कर चले गए अपने जुगाड़ के पास अपनी गर्मी का इंतेजाम करने।

मै पैदल ही घर की तरफ वापस लौट पड़ा।आज जो सुकून मुझे 3000 रूपये में उन नंगे बदन को ढकने का आया था वो संतुस्ती कभी किसी को 3000 रूपये दे के नंगा करने में नहीं आया था

आज मुझे वो सब रात याद आ रही थी जब मैंने 2000-5000 खर्च करके अपने तन की ठण्ड मिटाई थी

दो आंसू मेरी आँखों से ढल निकले
मेरे मन को गर्मी मिल गई थी
आज मैंने  मेरे जुगाड़ को छोड़ कर बहुत लोगो के लिए  गर्मी का इंतेजाम कर दिया था

नोट-ये कथा पूरी तरह से काल्पनिक है और इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।ये सिर्फ किताबी बाते है और आज के समाज में संभव नहीं है

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Tuesday, 15 April 2014

drive for happyness not for death




प्रिय मित्रो ,
कृपया कुछ समय निकल कर अवस्य पढ़े .....
शायद कुछ बाते किसी का जीवन बचा ले
कल फिर एक खबर सुनी की बेलपाड़ा के पास कार एक्सीडेंट में १ आदमी की मौत हो गई , परसों ही पूंजी पत्थर के पास एक एक्सीडेंट में एक ही परिवार के तीन लोगो की मौत हो गई ...
आखिर ये सब क्यों हो रहा है ?????
जब रस्ते खराब थे तो हम एक्सीडेंट्स के लिए रास्तो को दोष देते थे मगर उस समय एक्सीडेंट में मरने वालो की संख्या आज के मुकाबले बहुत काम थी ,अवस्य गाडियों की संख्या बढ़ी है मगर एक्सीडेंट उस से ज्यादा बढे है इसका कारण क्या है ,
ये जन कर आपको आश्चर्य होगा की हर साल भारत में जितने लोग विभिन्न प्रकार की बीमारी से
मरते है उससे कंही ज्यादा लोग सिर्फ एक्सीडेंट में मरते है
गलती किसकी है ????
मई मानता हु की गाडी एक तकनिकी चीज है जो कंही भी ख़राब हो सकती है और एक्सीडेंट्स का कारण बन सकती है ...
मगर शोध से पता चला है की एक्सीडेंट्स का मुख्या कारण लापरवाह ड्राइविंग और नियमो की अनदेखी है ,उदहारण के तौर पर दुर्घटनाओ में होने वाली ४०% मौत ड्राईवर के सीट बेल्ट न पहनने के कारण होती है ...
कई छोटे छोटे नियम अगर हम थोडा ध्यान दे के पालन करे तो हम ५०% से ज्यादा दुर्घटना रोक सकते है ..
१.बाइक चलते समय हेल मेट का उपयोग
२. कार चलते समय सीट बेल्ट का उपयोग
३.गाड़ी का सही रख रखाव (खास कर क्लच और ब्रेक )
४.हमेशा दाये चलाना
५.गाडी चलते समय मोबाइल का उपयोग ना करे
६.शराब या अन्य किसी प्रकार का नशा कर के गाडी न चलाये
७.ज्यादा तेज गाडी न चलाये
और ऐसे बहुत छोटी छोटी बाते है जिसे ध्यान में रख कर हम अपना और लोगो का जीवन सुरखित कर रखते है
याद रखिये
"donate blood but not on road "

Thursday, 10 May 2012

JAB UDAS HO JINDAGI

   JAB UDAS HO JINDAGI
Jab muskurahat kam aur dard zyada ho
jab ujala kam aur andhkaar zyada ho , to susta lo par himmat na haaro

jab lage ki rah hai mushkil,
 jab lage ki dur hai saahil,

jab lage ki haalata jit rahe ho,
jab lage ki ache din beet rahe ho,

jab lage ki dost saath nahi, 
jab lage ki safalta paas nahi,

jab galtiyan apne aap ko dohora rahi ho, jab hosle ki naav dagmaga rahi ho,

jab buraai zyada aur achai kam ho,
 jab roye dil aur aankhen namm ho,
to susta lo, par himmat na haaro.

Naa haaro himmat kyunki tum insaan ho, 
abhi dekha kya hai tumne tum naadaan ho,

aaj kaatein mile hai to kal gulaab bhi khilenge, 
aaj dushman mile hai to kal dost bhi milenge,

zindagi jine k liye hai harne k liye nahi, gamm bhagane k liye hai khud bhaagne k liye nahi,

aisa koi insaan nahi jispe koi musibat na aai ho, 
aisa koi suraj nahi jispar kabhi badli naa chai ho,

baadal chane par bhi kya suraj ruk jaata hai,
 raat ho to bhi kya chandrama ruk jata hai,

chattan nadi k raste badal sakte hain hosle nahi,
mehnat karo mit na sake aise koi faasle nahi,

zindagi har mod pe udaas nahi hogi, asafalta har samay paas nahi hogi,

aaj raat hui hai kal fir subha hogi, 
zindagi ki safalta se fir sulah hogi,

fir muskuraenge gamm hoton pe hasi ayegi
aaj roothi hai sahi magar kal zindagi fir muskuraegi.

मेरी ये रचना मेरे उदास समय की साथी है ये मैंने उस समय तैयार की थी जब में आर्थिक आभाव से जूझ रहा था और आर्थिक अस्थिरता वि वजह से मई बहुत डिप्रेस्स्ड रहता था । मेरी उदासी से निकली हुई ये कविता को पढ़ने के वाद मुझे बहुत हौसला  मिलता है और मुझे विपरीत परिस्थियों से लड़ने की प्रेरणा मिलाती है